केंद्रीय बजट 2025-26 के दौरान घोषित ज्ञान भारतम संस्कृति मंत्रालय (एमओसी) की एक प्रमुख पहल है। इसका उद्देश्य भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को उजागर करना और उसकी रक्षा करना और उसे संरक्षित करना है।
इस पहल का समर्थन करने के लिए स्थायी वित्त समिति (एसएफसी) ने 2025-2031 की अवधि के लिए 491.66 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं ताकि पांडुलिपियों से संबंधित गतिविधियों को विभिन्न घटकों के अंतर्गत किया जा सके। इनमें पांडुलिपियों का सर्वेक्षण और पंजीकरण, मजबूत प्रौद्योगिकी अवसंरचना और साझेदारी का निर्माण, प्रलेखन, संरक्षण, पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण और प्रकाशन तथा क्षमता निर्माण और अनुसंधान शामिल हैं।
2026-27 में बजट में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के लिए बजट वृद्धि के संबंध में विनियोग विधेयक (2026-27) को अभी संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना और राष्ट्रपति द्वारा सहमति दी जाना बाकी है।
अन्वेषण और उत्खनन के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) लिडार, जीपीआर और ड्रोन सर्वेक्षण जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करता है। राजगीर (बिहार), राखीगढ़ी (हरियाणा), भीष्मक नगर (अरुणाचल प्रदेश) और वारंगल किला (तेलंगाना) जैसे कुछ पुरातात्विक स्थलों पर उत्खनन से पहले लिडार, जीपीआर और ड्रोन सर्वेक्षण किए गए थे।
खुदाई से पहले आवश्यकतानुसार इन उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश सहित पूरे देश में केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों से अतिक्रमण हटाने के लिए सख्त कानूनी और प्रशासनिक उपाय किए जाते हैं। एएसआई नियमित निरीक्षण करता है और अनधिकृत निर्माण या अतिक्रमण रोकने के लिए नोटिस जारी करता है। प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 और प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल तथा अवशेष नियम, 1959 के प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई की जाती है । साथ ही सार्वजनिक परिसर (अनाधिकृत कब्जाधारियों को बेदखल करना) अधिनियम, 1971 के अंतर्गत बेदखली की कार्यवाही भी की जाती है।
राष्ट्रीय महत्व के संरक्षित स्मारकों के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज 2.0’ कार्यक्रम सितंबर 2023 में शुरू किया गया था । इसका उद्देश्य निजी/सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और गैर सरकारी संगठनों/ट्रस्टों/सोसाइटियों आदि के साथ जुड़ाव के लिए एक ढांचा तैयार करना था, ताकि संरक्षित स्मारकों में सुविधाओं का एक समूह विकसित/प्रदान किया जा सके। इससे आगंतुकों के अनुभव को बढ़ाया जा सके और उन्हें आगंतुक-अनुकूल बनाया जा सके।
हितधारकों या साझेदार संस्थाओं की भूमिका केवल गैर-संरक्षण संबंधी पहलुओं, जैसे स्मारक परिसर की सफाई, बुनियादी पर्यटक सुविधाओं जैसे शौचालय, पेयजल, बच्चों की देखभाल कक्ष, बेंच, रास्ते, कूड़ेदान, साइनेज, एसईएल शो, प्रकाश व्यवस्था आदि के प्रावधान और रखरखाव तक ही सीमित है। यह एएसआई के मार्गदर्शन और उचित परामर्श के अधीन होंगी।
पुरातत्व संरक्षण से संबंधित कार्य में एएसआई विशेषज्ञ वर्तमान ढांचे के अनुसार संरक्षित स्मारकों/स्थलों के संरक्षण का विशेष ध्यान रखते हैं।
भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार (एनएआई) ने अभिलेख-पटल नामक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से देश की दस्तावेजी विरासत को संरक्षित करने और इसकी सुलभता को लोकतांत्रिक बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटलीकरण पहल की है। इसके अंतर्गत अभिलेखीय अभिलेखों को विश्व स्तर पर सुलभ बनाया जा रहा है। फरवरी 2026 तक, इस पोर्टल पर 0.73 करोड़ संदर्भ सामग्री, 0.38 करोड़ डिजिटल अभिलेख और 18.23 करोड़ से अधिक पृष्ठ उपलब्ध हैं । इन पर 1,87,961 अद्वितीय आगंतुक और 35,167 पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं।
यह जानकारी केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने आज लोकसभा में लिखित प्रश्न के उत्तर में दी।
स्रोत: पीआईबी
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