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18% से 81% तक: पूर्ण साक्षरता की ओर भारत का सफ़र

पूर्ण साक्षरता की ओर भारत

पूर्ण साक्षरता की ओर भारत

साक्षरता भारत की विकास यात्रा का एक अहम स्तंभ बन गई है। यह सिर्फ़ पढ़ने-लिखने की क्षमता से कहीं आगे बढ़कर, हिसाब-किताब (न्यूमरेसी), डिजिटल कौशल, वित्तीय साक्षरता और समाज व अर्थव्यवस्था में सार्थक रूप से भाग लेने के लिए ज़रूरी अन्य क्षमताओं को भी शामिल करती है।

आज़ादी के बाद से भारत की साक्षरता दर में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। 1951 में साक्षरता दर 18.32 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 74.04 प्रतिशत हो गई। पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के अनुसार, कुल साक्षरता दर 81.1 प्रतिशत तक पहुँच गई है।

साक्षरता क्या है?

स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग साक्षरता को समझ के साथ पढ़ने, लिखने और हिसाब-किताब करने की क्षमता के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें पहचानना, समझना, व्याख्या करना और नई चीज़ें बनाना शामिल है। इसमें डिजिटल और वित्तीय साक्षरता जैसे जीवन के ज़रूरी कौशल भी शामिल हैं।

विभाग किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में 95 प्रतिशत साक्षरता दर को पूर्ण साक्षरता के बराबर मानता है।

यूनेस्को (UNESCO) भी साक्षरता को एक बुनियादी कौशल मानता है जो लोगों को पढ़ने, लिखने और संख्याओं के साथ-साथ डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करके समस्याओं को हल करने और काम, सीखने व रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भाग लेने में सक्षम बनाता है।

भारत की साक्षरता दर में कैसे सुधार हुआ है?

भारत ने पिछले कुछ दशकों में साक्षरता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

कुल साक्षरता दर 1951 में 18.32 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 74.04 प्रतिशत हो गई। इसी दौरान पुरुषों की साक्षरता दर 27.15 प्रतिशत से बढ़कर 82.14 प्रतिशत हो गई, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर 8.86 प्रतिशत से बढ़कर 65.46 प्रतिशत हो गई।

यह सुधार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में देखा गया है। शहरी साक्षरता दर 1951 में 34.59 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 84.1 प्रतिशत हो गई, जबकि ग्रामीण साक्षरता दर 12.10 प्रतिशत से बढ़कर 67.8 प्रतिशत हो गई। 2001 और 2011 के बीच, ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि ग्रामीण पुरुषों में यह वृद्धि 10 प्रतिशत थी।

PLFS 2025 के अनुसार, सात साल और उससे अधिक उम्र के लोगों में साक्षरता दर शहरी इलाकों में 89 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 77.4 प्रतिशत थी। इसी आयु वर्ग में, पुरुषों की साक्षरता दर शहरी इलाकों में 93.1 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 84.8 प्रतिशत थी, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर क्रमशः 84.8 प्रतिशत और 70.3 प्रतिशत थी।

स्कूल शिक्षा के ताज़ा आंकड़े क्या बताते हैं?

साक्षरता में सुधार इस बात पर भी निर्भर करता है कि बच्चे स्कूल में दाखिला लें, शिक्षा व्यवस्था में बने रहें और अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ें।

UDISE+ रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, स्कूलों में 24.72 करोड़ से ज़्यादा छात्र नामांकित थे।

ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो (GER) शुरुआती चरण (फाउंडेशनल स्टेज) में 42.8 प्रतिशत, तैयारी के चरण (प्रिपरेटरी स्टेज) में 91.7 प्रतिशत, मिडिल स्टेज में 89.6 प्रतिशत और सेकेंडरी स्टेज में 71.7 प्रतिशत था।

ड्रॉपआउट दरें तैयारी के चरण में 1.8 प्रतिशत, मिडिल स्टेज में 3.6 प्रतिशत और सेकेंडरी स्टेज में 7 प्रतिशत दर्ज की गईं।

ट्रांज़िशन दरें शिक्षा के चरणों के बीच छात्रों की आवाजाही को भी दर्शाती हैं। शुरुआती चरण से तैयारी के चरण में ट्रांज़िशन दर 99.2 प्रतिशत थी, जबकि तैयारी के चरण से मिडिल स्टेज में यह 93.8 प्रतिशत और मिडिल स्टेज से सेकेंडरी स्टेज में 88.3 प्रतिशत थी।

उच्च शिक्षा के बारे में क्या?

पिछले दशक में उच्च शिक्षा में भागीदारी भी बढ़ी है।

छात्रों का नामांकन 2014-15 में 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में 4.50 करोड़ हो गया। इसी अवधि के दौरान, उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो 23.7 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया।

उच्च शिक्षा पूरी करने वाले छात्रों की संख्या भी 2014-15 में 88.28 लाख से बढ़कर 2023-24 में 1.09 करोड़ से ज़्यादा हो गई।

सरकार ने इन प्रयासों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उस लक्ष्य से जोड़ा है, जिसके तहत 2035 तक उच्च शिक्षा में 50 प्रतिशत ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो हासिल करना है।

उल्लास: वयस्कों के बीच साक्षरता का विस्तार

वयस्क साक्षरता के लिए प्रमुख पहलों में से एक है ULLAS – समाज में सभी के लिए आजीवन सीखने की समझ, जिसे न्यू इंडिया साक्षरता कार्यक्रम के रूप में भी जाना जाता है।

केंद्र प्रायोजित योजना 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन लोगों पर केंद्रित है जो औपचारिक स्कूली शिक्षा से चूक गए। यह कार्यात्मक साक्षरता, संख्यात्मकता, महत्वपूर्ण जीवन कौशल और आजीवन सीखने के अवसर प्रदान करता है।

कार्यक्रम ‘जन जन साक्षर’ के दृष्टिकोण का अनुसरण करता है और जनभागीदारी के सिद्धांत के तहत स्वयंसेवा और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।

ULLAS एक हाइब्रिड लर्निंग मॉडल का उपयोग करता है। इसका मोबाइल एप्लिकेशन आईओएस और एंड्रॉइड पर उपलब्ध है और 27 भाषाओं में शिक्षण सामग्री प्रदान करता है।

जिला और ब्लॉक स्तर पर सर्वेक्षण के माध्यम से शिक्षार्थियों की पहचान की जाती है। शिक्षक, नागरिक समाज कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सहित स्वयंसेवक कार्यक्रम के माध्यम से शिक्षार्थियों का समर्थन कर सकते हैं।

सीखने की प्रक्रिया पूरी करने के बाद, प्रतिभागी फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी असेसमेंट टेस्ट या FLNAT के लिए उपस्थित होते हैं, जिसके बाद मूल्यांकन और प्रमाणन होता है।

कार्यक्रम का लक्ष्य 2022 और 2027 के बीच ₹1,037.90 करोड़ के वित्तीय परिव्यय के साथ पांच करोड़ शिक्षार्थियों को कवर करना है।

अब तक, 52.20 लाख से अधिक स्वयंसेवकों के साथ, लगभग 4.03 करोड़ शिक्षार्थियों ने ULLAS के तहत पंजीकरण कराया है। FLNAT में 3.3 करोड़ से अधिक शिक्षार्थियों ने भाग लिया है।

दस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों – लद्दाख, मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, सिक्किम, उत्तराखंड और जम्मू और कश्मीर – ने 2024 और 2026 के बीच खुद को पूर्ण साक्षर घोषित किया है।

निपुण भारत: बुनियादी शिक्षा पर ध्यान

जहाँ ULLAS (उल्लास) वयस्कों की साक्षरता पर ध्यान देता है, वहीं निपुण भारत बच्चों की बुनियादी शिक्षा पर काम करता है।

समग्र शिक्षा के तहत जुलाई 2021 में शुरू की गई ‘नेशनल इनिशिएटिव फॉर प्रोफिशिएंसी इन रीडिंग विद अंडरस्टैंडिंग एंड न्यूमेरेसी’ (निपुण भारत) का लक्ष्य 2026-27 तक सभी के लिए बुनियादी साक्षरता और संख्या-ज्ञान हासिल करना है।

यह मिशन ‘फाउंडेशनल स्टेज’ (बुनियादी चरण) के बच्चों पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसमें 3 से 8 साल की उम्र के बच्चे शामिल हैं। इसका मकसद यह पक्का करना है कि बच्चे दूसरी कक्षा तक बुनियादी कौशल सीख लें।

शिक्षा को बढ़ावा देने वाली अन्य पहल

कई अन्य सरकारी कार्यक्रम साक्षरता और बुनियादी शिक्षा के प्रयासों में मदद करते हैं।

समग्र शिक्षा स्कूल की प्रभावशीलता, समान अवसरों और बेहतर सीखने के नतीजों पर ध्यान देती है। यह बुनियादी शिक्षा, शिक्षकों के विकास और व्यावसायिक शिक्षा को भी बढ़ावा देती है।

PM SHRI (प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) का मकसद 14,500 से ज़्यादा बेहतरीन स्कूलों को मज़बूत करना और सीखने का ऐसा माहौल बनाना है जो सर्वांगीण, समावेशी और सबके लिए समान हो।

PM e-VIDYA सीखने के कई तरीके उपलब्ध कराने के लिए डिजिटल, ऑनलाइन और ऑन-एयर शिक्षा पहलों को एक साथ लाता है। इससे लगभग 25 करोड़ स्कूली बच्चों को फ़ायदा होने की उम्मीद है।

PM POSHAN योजना के तहत, सभी स्कूल के दिनों में 10.36 लाख सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में बाल वाटिका और कक्षा 1 से 8 तक के 11.20 करोड़ छात्रों को एक बार का गर्म पका हुआ भोजन दिया जाता है। इस योजना का मकसद पोषण संबंधी सहायता देना और साथ ही स्कूल में बच्चों की भागीदारी को बढ़ावा देना है।

विकसित भारत के लिए साक्षरता ज़रूरी है

साक्षरता का असर सिर्फ़ शिक्षा के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। यह रोज़गार, उत्पादकता, आर्थिक भागीदारी, महिलाओं के सशक्तिकरण और सामाजिक समावेश में मदद कर सकती है।

इस बैकग्राउंडर में साक्षरता और शिक्षा को ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल 4’ (सतत विकास लक्ष्य 4) से जोड़ा गया है, जो सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा और जीवन भर सीखने के मौकों पर ज़ोर देता है।

भारत के विकास के विज़न के लिए, साक्षरता को अब कौशल के एक बड़े दायरे के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें डिजिटल क्षमताएं, वित्तीय समझ, बुनियादी शिक्षा और जीवन भर चलने वाली शिक्षा शामिल हैं।

आगे का रास्ता

भारत की साक्षरता यात्रा मुख्य रूप से बुनियादी पढ़ने-लिखने पर ध्यान देने से आगे बढ़कर सीखने और भागीदारी की व्यापक समझ की ओर बढ़ी है।

NEP 2020, ULLAS और NIPUN भारत इस नज़रिए के अलग-अलग हिस्से हैं — बच्चों की बुनियादी शिक्षा से लेकर वयस्क शिक्षा और जीवन भर सीखने तक।

सरकार के बैकग्राउंडर में कहा गया है कि साक्षरता का फ़ायदा समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाने के लिए इसे लगातार लागू करना और क्षेत्रीय व लैंगिक असमानताओं पर ज़्यादा ध्यान देना ज़रूरी होगा।

जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत’ के विज़न की ओर बढ़ रहा है, एक कुशल, जागरूक और सशक्त आबादी बनाने के लिए साक्षरता और शिक्षा अहम बने हुए हैं।

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