सुपरकंप्यूटिंग के क्षेत्र में भारत का सफ़र तकनीकी महत्वाकांक्षा, स्वदेशी इनोवेशन और लगातार राष्ट्रीय निवेश की एक शानदार कहानी है। 1991 में एक गीगाफ्लॉप की कंप्यूटिंग स्पीड वाले ‘परम 8000’ (PARAM 8000) के लॉन्च से लेकर आज 40 सुपरकंप्यूटर वाले ऐसे इकोसिस्टम तक, जिनकी कुल क्षमता 68 पेटाफ्लॉप है, भारत ने लंबा सफ़र तय किया है। इस बदलाव के केंद्र में ‘नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन’ (NSM) है, जिसे 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शुरू किया गया था।
यह विकास उस बड़े विज़न को दिखाता है जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा बढ़ावा दिया है – एक ऐसा भारत जो न केवल एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है, बल्कि उसे देश के भीतर विकसित, निर्मित और लागू भी करता है। लगभग 4,500 करोड़ रुपये के बजट वाला नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन इसी विज़न को हकीकत में बदलता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा संयुक्त रूप से संचालित यह मिशन, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग में आत्मनिर्भरता हासिल करने और विश्व-स्तरीय सुपरकंप्यूटिंग इकोसिस्टम बनाने का लक्ष्य रखता है।
प्रगति का पैमाना काफी बड़ा है। सितंबर 2026 तक, भारत ने 68 पेटाफ्लॉप की कुल क्षमता वाले 40 सुपरकंप्यूटर तैनात किए हैं, जिनमें 13 हाई-एंड सिस्टम शामिल हैं जिनकी क्षमता एक पेटाफ्लॉप से ज़्यादा है। 12 अन्य सिस्टम की क्षमता 500 टेराफ्लॉप और एक पेटाफ्लॉप के बीच है, जबकि 15 सिस्टम की क्षमता 500 टेराफ्लॉप से कम है। इस मिशन का लक्ष्य शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों में कुल 123 पेटाफ्लॉप से ज़्यादा क्षमता वाले 50 सुपरकंप्यूटर स्थापित करना है।
यह विस्तार सिर्फ़ आंकड़ों की वजह से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि सुपरकंप्यूटिंग से कई नई चीज़ें संभव हो पाती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मौसम का पूर्वानुमान, क्लाइमेट मॉडलिंग, दवा की खोज, जीनोमिक्स, आपदा प्रबंधन, अंतरिक्ष अनुसंधान और एडवांस्ड इंजीनियरिंग के लिए हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग तेज़ी से ज़रूरी होती जा रही है। भारत दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत डेटा जेनरेट करता है, जिससे शक्तिशाली कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच एक रणनीतिक ज़रूरत बन गई है।
मोदी सरकार का घरेलू क्षमता पर ज़ोर खास तौर पर उल्लेखनीय है। NSM के तहत, भारत ने घरेलू सर्वर, सिस्टम सॉफ़्टवेयर, हाई-स्पीड इंटरकनेक्ट नेटवर्क और कूलिंग टेक्नोलॉजी विकसित की हैं। C-DAC द्वारा डिज़ाइन और विकसित ‘रुद्र’ (Rudra) सीरीज़ के सर्वर एक बड़ी उपलब्धि साबित हुए हैं। सितंबर 2026 तक, ‘परम रुद्र’ (PARAM Rudra) सुपरकंप्यूटर में 6,000 रुद्र सर्वर लगाए जा चुके थे, और 1,500 और सर्वर बनाए जा रहे थे।
यहीं पर प्रधानमंत्री मोदी का ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर ज़ोर तकनीकी गहराई हासिल करता है। आज आत्मनिर्भरता सिर्फ़ रोज़मर्रा के सामान बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल अर्थव्यवस्था के सबसे एडवांस्ड स्तरों तक फैली हुई है। देश में ही ज़रूरी कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने से भारत की रणनीतिक आज़ादी मज़बूत होती है और आयातित टेक्नोलॉजी पर निर्भरता कम होती है।
इस इंफ्रास्ट्रक्चर के सामाजिक इस्तेमाल इस उपलब्धि को और भी सार्थक बनाते हैं। सुपरकंप्यूटिंग का इस्तेमाल बाढ़ की भविष्यवाणी, जंगल की आग की मॉडलिंग, शहरी प्रदूषण और मौसम का पूर्वानुमान, भूकंपीय इमेजिंग, जीनोमिक्स और नई दवाइयों की खोज के लिए किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाला सिस्टम नदी बेसिन में दो दिन पहले ही बाढ़ का अनुमान लगा सकता है। ऐसी क्षमताएं लोगों की जान, आजीविका और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा में सीधे तौर पर योगदान दे सकती हैं।
यह मिशन भारत की ह्यूमन कैपिटल (मानव संसाधन) को भी बेहतर बना रहा है। NSM इंफ्रास्ट्रक्चर से 400 से ज़्यादा संस्थानों के 16,000 से ज़्यादा रिसर्चर्स (जिनमें 2,900 से ज़्यादा PhD स्कॉलर्स शामिल हैं) को फ़ायदा हुआ है। 1.5 करोड़ से ज़्यादा कंप्यूट जॉब्स पूरी की गई हैं, जिनसे 1,990 से ज़्यादा रिसर्च पब्लिकेशन तैयार हुए हैं। ट्रेनिंग प्रोग्राम, हैकाथॉन, बूटकैंप, फैकल्टी डेवलपमेंट पहल और खास लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप लर्निंग में कुशल प्रोफेशनल्स का एक बड़ा ग्रुप बनाने में मदद कर रहे हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वदेशी टेक्नोलॉजी और कुशल मानव संसाधनों का यह मेल प्रधानमंत्री मोदी की उस व्यापक विकास सोच को दिखाता है, जिसमें ऐसी क्षमताएं बनाने पर ज़ोर दिया जाता है जो आगे और क्षमताएं पैदा कर सकें। मकसद सिर्फ़ मशीनें हासिल करना नहीं है, बल्कि एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना है जिसमें भारतीय रिसर्चर्स, स्टूडेंट्स, संस्थान, स्टार्टअप्स और इंडस्ट्रीज़ टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नई खोज (इनोवेशन) कर सकें।
नेशनल नॉलेज नेटवर्क, एकेडमिक और रिसर्च संस्थानों की सुपरकंप्यूटिंग सुविधाओं को एक हाई-स्पीड नेशनल नेटवर्क से जोड़कर इस इकोसिस्टम को और मज़बूत बनाता है। यह रिसर्चर्स को कंप्यूटेशनल रिसोर्स शेयर करने, भौगोलिक सीमाओं से परे मिलकर काम करने और वैज्ञानिक खोजों को तेज़ी से आगे बढ़ाने में मदद करता है।
आगे का रास्ता भी उतना ही महत्वाकांक्षी है। हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को जोड़ने से खेती और हेल्थकेयर से लेकर एनर्जी, क्लाइमेट साइंस और नई दवाओं की खोज जैसे क्षेत्रों में बदलाव आ सकता है। सरकार, एकेडमिया, इंडस्ट्री, स्टार्टअप्स और रिसर्च संस्थानों को एक साथ लाकर, भारत एडवांस्ड कंप्यूटिंग को राष्ट्रीय विकास के लिए व्यावहारिक समाधानों में बदल सकता है।
2047 तक ‘विकसित भारत’ का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विज़न वैज्ञानिक क्षमता, तकनीकी आत्मविश्वास, स्वदेशी इनोवेशन और कुशल वर्कफोर्स जैसी नींव पर टिका है। इसलिए, एक-गीगाफ्लॉप वाले PARAM 8000 से बढ़कर 68-पेटाफ्लॉप वाले सुपरकंप्यूटिंग इकोसिस्टम तक भारत का सफ़र सिर्फ़ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है। यह उस भारत का एक मज़बूत प्रतीक है जो तेज़ी से अपना भविष्य खुद बनाने में सक्षम हो रहा है।
सुपरकंप्यूटिंग की यह कहानी दिखाती है कि जब रणनीतिक सोच के साथ लगातार निवेश और स्वदेशी इनोवेशन का मेल होता है, तो जो टेक्नोलॉजी कभी कुछ एडवांस्ड देशों तक ही सीमित मानी जाती थीं, वे राष्ट्रीय बदलाव का ज़रिया बन सकती हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भारत तेज़ी से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने वाले देश से टेक्नोलॉजी बनाने वाले देश की ओर बढ़ रहा है – यह एक मज़बूत, आत्मनिर्भर और विकसित भारत की यात्रा में एक ज़रूरी बदलाव है।
