धर्म

अनंत चतुर्दशी 2022 की कथा: अनंत भगवान का व्रत जिसे पांडवों ने भी किया था

अनंत चतुर्दशी 2022 की कथा: अनंत चतुर्दशी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है।इस बार 9 सितंबर 2022 शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी है। इस दिन को अनंत चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन अनंत भगवान विष्णु के अनंत रूपों की पूजा की जाती है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को अनंत फल की प्राप्ति होती है.इस व्रत को गणेश विसर्जन क्व दिन किया जाता है। यह दिन 10 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का अंतिम दिन होता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि अनंत चतुर्दशी का व्रत 14 वर्ष तक लगातार करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

अनंत चतुर्दशी का व्रत पांडवों ने भी रखा था

जब जुए में अपना राज्य खोकर पांडव जंगल में परेशान थे, तो भगवान कृष्ण ने पांडवो को अनंत चतुर्दशी व्रत रखने की सलाह दी,और पांडवों ने अपने वनवास में हर वर्ष यह व्रत रखा था। इस व्रत का ही प्रभाव था कि पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए थे। और यह भी कहा जाता है कि इस अनंत चतुर्दशी के प्रभाव से ही सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को भी अपना राज्य वापस मिल गया था।

भगवान कृष्ण ने इस व्रत का महत्व समझाने के लिए एक कथा सुनाई, जो इस प्रकार है

प्राचीन काल में एक तपस्वी ब्राह्मण थे जिनका नाम सुमंत और उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था। सुमंत और दीक्षा की एक अत्यंत सुंदर और गुणी पुत्री थी, जिसका नाम सुशीला था। जब सुशीला बड़ी हुई तो उनकी मां दीक्षा का स्वर्गवासी हो गयी। सुमंत ने अपनी पत्नी दीक्षा की मृत्यु के बाद कारकशा नाम की एक महिला से विवाह कर ली,और सुमंत ने सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से किया।

करकाशा ने विदाई के समय दामाद को कुछ ईंट-पत्थर के टुकड़े बांध दिए। कौंडिन्य ऋषि अपनी पत्नी के साथ अपने आश्रम के लिए रवाना हुए। रास्ते में शाम हो गई तो ऋषि नदी के किनारे संध्या अर्पित करने लगे। इस दौरान सुशीला ने देखा कि कई महिलाएं किसी देवता की पूजा कर रही हैं। सुशीला ने महिलाओं से पूछा कि वे किससी पूजा अर्चना कर रही हैं, महिलाओं ने सुशीला को बताया कि वे भगवान अनंत की पूजा कर रही है जिसे करने और इस दिन उनके व्रत रखने से मनोकामनाएं पूरी होती है व्रत के महत्व के बारे में और बताने लगी। व्रत का महत्व जानकर सुशीला ने वहां पर अनुष्ठान किया और हाथ में चौदह गांठें बांधकर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गईं।

ऋषि कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। ऋषि कौंडिन्य ने यह सब मानने से इंकार कर दिया और पवित्र धागा निकालकर आग में फेंक दिया। इसके बाद उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वह दुखी रहने लगा। जब उसने अपनी पत्नी से इस दरिद्रता का कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत ईश्वर की डोरी जलाने की बात कही। पश्चाताप कर ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे को प्राप्त करने के लिए वन में चले गए और कई दिनों तक जंगल में भटकते रहे, एक दिन वह जमीन पर गिर गए।

तब भगवान अनंत प्रकट हुए और कहा, हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, इसलिए तुम्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा। तुम उदास हो गए हो। अब तुमने पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूं,अब तुम घर जाओ और विधिपूवर्क व्रत करो 14 वर्षो तक उपवास करने से तुम्हारा यह दुख दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे।ऋषि कौंडिन्य ने भगवान ने जैसा कहा था वैसा ही किया और ऋषि कौंडिन्य को सभी कष्टों से मुक्ति मिल गई।

भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान के लिए 14 साल का उपवास किया और इस प्रभाव के कारण पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए और हमेशा के लिए शासन किया। इसके बाद ही अनंत चतुर्दशी के माहात्म्य को लोगो ने जाना और यह व्रत प्रचलन में आया।

(इस लेख में दी गई जानकारी आम जनहित को ध्यान में रखकर ही प्रस्तुत किया गया है  जो धार्मिक मान्यताओं और धर्मनिरपेक्ष मान्यताओं पर आधारित है, संभवतः क्षेत्रों के आधार पर कुछ बदलाव हो)

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