ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा ने अपनी कमियों को उजागर किया
केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश करते हुए कहा कि ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम भारत की सामाजिक सुरक्षा ढ़ांचे में पिछले दो दशकों से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया गया है।
वर्ष 2005 से मनरेगा को जब से अधिनियमित किया गया है इसने दैनिक मजदूरी ग्रामीण आमदनी को सुदृढ़ करते हुए और आधारभूत संरचना का सृजन करते हुए ग्रामीण परिवारों के अकुशल कार्य के लिए कम से कम 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया है।
बढ़ते समय के साथ-साथ आमदनी में वृद्धि, संपर्क का विस्तार, व्यापक रूप से डिजिटल पहुंच और आजीविका की उपलब्धता ने ग्रामीण रोजगार जरूरतों की प्रकृति में बदलाव लाया है और यह योजना की उपलब्धियों और इसके डिजाइन तथा उद्देश्य के पुन: मूल्यांकण की जरूरतों पर जोर देता है। वर्षों से प्रशासनिक और प्रौद्योगिकी सुधारों के परिणामस्वरूप इस योजना के कार्यान्वयन का विस्तार हुआ है, जिसको हम उल्लेखनीय भागीदारी, पारदर्शिता और डिजिटल शासन के रूप में देख सकते हैं। महिलाओं की भागीदारी वित्त वर्ष 2014 में 48 प्रतिशत थी वह वित्त वर्ष 2025 में 58.1 प्रतिशत हो गई। आधार आधारित भुगतान प्रणाली को व्यापक रूप से अपनाया गया और इलेक्ट्रॉनिक दैनिक मजदूरी सबके लिए एक जैसी हो गई। जीओ टैग संसाधनों के व्यापक विस्तार और पारिवारिक स्तर पर व्यक्तिगत संसाधनों में वृद्धि के साथ कार्यों की निगरानी में सुधार हुआ है। क्षेत्र स्तरीय कर्मचारियों ने सीमित संसाधनों में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहण किया।
इसके अलावा इन फायदों ने गहरे संरचनात्मक मुद्दों को रेखांकित किया। अनेक राज्यों में निगरानी से जमीनी स्तर पर कार्यों का न होना, कार्य की प्रगति के लिए हुए खर्चे का मिलान न होना, गहन श्रमिक कार्य में मशीनों का उपयोग और डिजिटल उपस्थिति प्रणाली का लगातार उपयोग न करना जैसी खामियां उजागर हुई हैं। समय से अधिक कार्य के लिए दिए जाने वाले भत्ते में अनियमितता और महामारी के बाद और कुछ ही ग्रामीण परिवारों ने पूरे 100 दिन तक कार्य किया जो दर्शाता है कि जबकि वितरण तंत्र में सुधार हुआ। कुल मिलाकर मनरेगा की सीमितता और इसकी गड़बडि़यों ने ग्रामीण वास्तविकता ने इसके पुनमूर्ल्यांकन की ओर प्रेरित किया।
मनरेगा की इन कमियों को देखते हुए सरकार ने विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम-2025 को अधिनियमित किया। जिसे वीबी-जी राम जी अधिनियम 2025 के नाम से भी संदर्भित किया गया। यह अधिनियम मनरेगा को व्यापक रूप से कानूनी वैद्यता प्रदान करता है, जो ग्रामीण रोजगार को विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण से जोड़ने का काम करता है और जवाबदेही और आय सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। वीबी जी राम जी अधिनियम 2025 भारत की ग्रामीण रोजगार नीति में निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि मनरेगा ने लोगों की भागीदारी और पारर्शिता के मामले में महत्वपूर्ण लाभ हासिल किए हैं, वहीं इसकी संरचनात्मक कमियों ने इसकी प्रभावकारिता को सीमित कर दिया। नए अधिनियम अतित की कमियों को दूर करते हुए आधुनिक जिम्मेदार और अवसंरचना केंद्रित ढांचे का निर्माण किया है।
वीबी-जी-राम-जी अधिनियम, 2025 की मुख्य विशेषताएं
पारिश्रमिक और सामाजिक सुरक्षा के उपाय
इस अधिनियम की विशेषता है कि इसमें पारिश्रमिक का भुगतान साप्ताहिक रूप में होगा या कार्य के समाप्त होने या 15 दिन पर किया जाएगा। समय पर मजदूरी का इस तरह से भुगतान मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करता है और मनरेगा के तहत उनकी भागीदारी में जो कमी देखी गई थी वह दूर होगा।
प्रशासनिक मजबूती और क्षमता निर्माण
मनरेगा कार्य सीमित संसाधनों के बावजूद क्षेत्रीय स्तर के कामगार की महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देते हुए वीबी-जी-राम-जी प्रशासनिक व्यय की सीमा को कुल व्यय का 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत करके कामगारों की मदद करके प्रशिक्षण, पारिश्रमिक और तकनीकी क्षमताओं के बलपर विकसित भारत जी-राम-जी ग्रामीण प्रशासनिक क्षमता को बढ़ता है। यह बदलाव योजना में सुधार, कार्यान्वयन और सेवा में सभी स्तरों पर जिम्मेवारी को बढ़ावा देता है।
योजना का विकेन्द्रिकरण और स्थानीय सशक्तिकरण
वीबी-जी-राम-जी के अंतर्गत योजनाएं विकसित ग्राम प्रंचायत योजना के माध्यम से स्थानीय वास्तविकताओं को आधार बनाकर तैयार की गई हैं, जो स्थानीय रूप से राष्ट्रीय प्रणाली के तहत एकीकृत हैं जैसे पीएम गति-शक्ति। इस अधिनियम में ग्राम पंचायत निरंतर केंद्रीय भूमिका का निर्वहन करेगा। यह कम से कम आधे कार्यों को लागू करता है। भागीदारी योजना ग्रामीण विकास को सुनिश्चित करते हुए समुदाय की जरूरतों के प्रति उत्तरदायी है।
मूल्य सृजन और राष्ट्रीय विकास एकीकरण
सभी संपत्तियों का सृजन वीबी-जी-राम-जी के अंतर्गत किया जाएगा जो एकीकृत और समन्वित विकास की रणनीति को सुनिश्चित करता है। इसमें स्थानीय कार्य को बड़ी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को रखा गया है। यह अधिनियम एक ओर जहां ग्रामीण आजीविका की तुरंत समर्थन करता है वहीं दूसरी ओर दीर्घकालिक रणनीतिक अवसंरचना, परिणाम को भी रेखांकित करता है।
पारदर्शिता, जिम्मेवारी और निगरानी
यह अधिनियम पूरी प्रणाली में पारदर्शिता और जिम्मेदारी का विस्तार करता है। इसमें केंद्र को अधिकार है कि वह शिकायतों की जांच करे, मामलों में गंभीर अनियमिततओं को देखते हुए धन आवंटन को रोक दे और उन उपायों को लागू करे जो अधिनियम को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हैं। समय पर निगरानी से डिजिटल शासन मजबूत होगा। जीपीएस के माध्यम से कार्यों की निगरानी, एमआईएस डेसबोर्ड और साप्ताहिक आधार पर सूचना प्रदान की जाएगी। हर छह महीने में सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य है। जिसमें जीपीएस की सामुदायिक भागीदारी और दृयता को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। केंद्र और राज्य की स्थायी समितियां निरंतर अपने मार्गदर्शन, अंतरदृष्टि और समन्वय से इस कार्य को आगे बढ़ाएगा, जबकि डिजिटल उपकरण जैसे बायोमैट्रिक और एआई निगरानी अनियमितताओं को दूर करने में प्रभावी भूमिका निभाएगा।
वित्तीय स्थिरता
इस अधिनियम का वित्तीय ढांचा भविष्य के लिए कोष सुनिश्चित करता है जबकि राज्यों पर अवांछित बोझ को कम करता है। आपदा के दौरान इन राज्यों को वित्तीय और अतिरिक्त सहायता भी मुहैया कराएगा और सतत वित्तीय ढांचा मुहैया कराएगा। मजबूत अंतरदृष्टि और जिम्मेवारी से भविष्य के जोखिम कम होंगे जिससे सार्वजनिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग संभव हो पाएगा।
स्रोत: पीआईबी
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