भारत के जलमार्गों का सफर: एक सुरक्षित और स्मार्ट नेटवर्क का निर्माण
नदियों के रास्ते माल ढुलाई (कार्गो मूवमेंट) में लगातार हो रही वृद्धि को देखते हुए, भारत हाइड्रोग्राफिक सर्वे, आधुनिक नेविगेशन इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल सूचना प्रणालियों के जरिए अपने अंतर्देशीय जलमार्ग नेटवर्क को मजबूत कर रहा है। जहाजों की रियल-टाइम ट्रैकिंग से लेकर ब्रह्मपुत्र नदी पर देश के पहले रिवरिन लाइटहाउस (नदी के किनारे बने लाइटहाउस) बनाने तक, इन पहलों का मकसद पूरे देश में नेविगेशन सुरक्षा, परिचालन दक्षता और कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना है।
अंतर्देशीय जलमार्ग भारत के परिवहन नेटवर्क के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में उभर रहे हैं। ये माल ढुलाई का एक किफायती और अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ साधन हैं। बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के अनुसार, जलमार्ग से एक टन माल भेजने का खर्च सड़क परिवहन के मुकाबले लगभग एक-तिहाई और रेल परिवहन के मुकाबले आधा होता है। साथ ही, इसमें कार्बन उत्सर्जन भी बहुत कम होता है।
भारत में 111 राष्ट्रीय जलमार्ग हैं, जो 23 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में 20,187 किलोमीटर तक फैले हुए हैं। इनमें से 32 जलमार्ग अभी चालू हैं।
माल ढुलाई में हुई वृद्धि, इस परिवहन नेटवर्क के बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाती है। अंतर्देशीय जलमार्गों के जरिए होने वाली माल ढुलाई 2014-15 में 29 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 में 218 मिलियन मीट्रिक टन हो गई है, जो 20.13 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) को दिखाती है। यह आंकड़ा ‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ के तहत तय किए गए 200 मिलियन टन के लक्ष्य को भी पार कर गया है।
जैसे-जैसे ट्रैफिक बढ़ रहा है, जहाजों के चलने के लिए रास्तों (नेविगेबल चैनल्स) का रखरखाव करना और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण: नदी की स्थिति का मानचित्रण
नदियाँ लगातार बदल रही हैं, जल स्तर, तलछट जमा और नदी तल की संरचनाएँ मौसम और विस्तार के अनुसार बदलती रहती हैं। ये परिवर्तन नेविगेशन चैनलों की गहराई और जहाजों के लिए उपलब्ध मार्गों को प्रभावित कर सकते हैं।
हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण पानी की गहराई, नदी तल की रूपरेखा, उथले पानी, प्रवाह की विशेषताओं और नदी की आकृति विज्ञान में परिवर्तन को मापकर इन स्थितियों का आकलन करने में मदद करते हैं। भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) नेविगेशन योजना, ड्रेजिंग और परिवहन बुनियादी ढांचे के विकास का समर्थन करने के लिए राष्ट्रीय जलमार्गों में ये सर्वेक्षण आयोजित करता है।
थालवेग सर्वेक्षण नदी के विस्तार के साथ सबसे गहरे नौगम्य चैनल की पहचान और निगरानी करते हैं, जबकि टर्मिनल और जेटी सर्वेक्षण पानी की गहराई और लोडिंग और अनलोडिंग सुविधाओं के पास की स्थिति का आकलन करते हैं।
सितंबर 2026 तक, नियमित थालवेग सर्वेक्षणों में 22 राष्ट्रीय जलमार्ग शामिल थे। व्यक्तिगत जलमार्गों की आवश्यकताओं के आधार पर, सर्वेक्षण साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक आयोजित किए जाते हैं। निगरानी प्रणाली भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग के भारतीय हिस्से को भी कवर करती है, जो निर्दिष्ट नदी चैनलों के माध्यम से भारत और बांग्लादेश के बीच कार्गो आवाजाही की सुविधा प्रदान करती है।
इन सर्वेक्षणों का एक महत्वपूर्ण परिणाम न्यूनतम उपलब्ध गहराई (एलएडी) का निर्धारण है, जो एक निर्दिष्ट अवधि के दौरान नेविगेशन चैनल में उपलब्ध न्यूनतम पानी की गहराई को इंगित करता है।
एलएडी पोत संचालन के लिए एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है क्योंकि यह अनुमेय पोत ड्राफ्ट, कार्गो-वहन क्षमता, मार्ग निर्धारण और मौसमी नेविगेशन निर्णयों को प्रभावित करता है। सटीक गहराई की जानकारी ऑपरेटरों को मौजूदा नदी स्थितियों के अनुसार यात्रा की योजना बनाने में मदद करती है।
नेविगेशन सहायता से सुरक्षा में सुधार होता है
नदी की स्थिति को समझने के अलावा, जहाजों को नौगम्य चैनलों की पहचान करने, खतरों को चिह्नित करने और अलग-अलग मौसम और दृश्यता स्थितियों में सुरक्षित रूप से नेविगेट करने के लिए विश्वसनीय प्रणालियों की आवश्यकता होती है।
इन प्रणालियों को नेविगेशन के लिए सहायता (एटीओएन) के रूप में जाना जाता है और नेविगेशन के लिए समुद्री सहायता अधिनियम, 2021 के तहत मान्यता प्राप्त है। इनमें सुरक्षित और कुशल नेविगेशन का समर्थन करने के लिए डिज़ाइन किए गए बॉय, चैनल मार्कर, रडार बीकन, लाइटहाउस संरचनाएं और अन्य उपकरण शामिल हैं।
लाइटहाउस और लाइटशिप महानिदेशालय भारत के समुद्र तट पर नेविगेशन के लिए सामान्य सहायता के विकास, रखरखाव और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। IWAI व्यक्तिगत मार्गों की आवश्यकताओं के अनुसार अंतर्देशीय जलमार्गों पर नेविगेशन सहायता बनाए रखता है।
केरल में राष्ट्रीय जलमार्ग-3 इस बुनियादी ढांचे का एक उदाहरण प्रदान करता है। पश्चिमी तट नहर प्रणाली कोट्टापुरम को कोल्लम से जोड़ती है और इसमें चंपकारा और उद्योगमंडल नहरें शामिल हैं। संपूर्ण नौगम्य खंड चौबीसों घंटे जहाज की आवाजाही का समर्थन करने के लिए नेविगेशन की सहायता से सुसज्जित है।
जलमार्ग में 312 सौर ऊर्जा से चलने वाले प्रकाशयुक्त फाइबरग्लास-प्रबलित प्लास्टिक (एफआरपी) प्लव और 17 बीकन लैंप पोस्ट हैं।
ब्रह्मपुत्र में बनेंगे भारत के पहले नदी-आधारित लाइटहाउस
आंतरिक जल परिवहन के क्षेत्र में मार्च 2026 में एक बड़ा कदम उठाया गया, जब भारत ने ब्रह्मपुत्र नदी पर अपने पहले चार ‘नदी-आधारित लाइटहाउस’ (riverine lighthouses) बनाने की घोषणा की। ब्रह्मपुत्र के इस हिस्से को ‘नेशनल वॉटरवे-2’ (राष्ट्रीय जलमार्ग-2) के रूप में जाना जाता है।
ये लाइटहाउस पांडु, बोगीबील, सिलघाट और विश्वनाथ घाट पर बनाए जा रहे हैं। इस परियोजना की कुल लागत 74 करोड़ रुपये है।
इन लाइटहाउस का उद्देश्य जल परिवहन के लिए बेहतर मार्गदर्शन और निगरानी प्रदान करना है। ये जमीन से 20 मीटर ऊंचे होंगे और इनकी भौगोलिक पहुंच 14 नॉटिकल मील तक होगी। इनकी रोशनी 8 से 10 नॉटिकल मील की दूरी तक जाएगी, जिससे रात के समय जहाजों को आवाजाही में मदद मिलेगी।
ये पूरी तरह से सौर ऊर्जा से चलेंगे। इनमें मौसम की जानकारी देने वाले सेंसर भी लगे होंगे, जो जल परिवहन और सुरक्षा से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी प्रदान करेंगे।
इस परियोजना में आम लोगों के लिए कई सुविधाएं भी शामिल हैं, जैसे कि संग्रहालय, एम्फीथिएटर (खुले रंगमंच), कैफेटेरिया, सुंदर बगीचे, बच्चों के खेलने की जगह और यादगार वस्तुएं (सॉवेनियर) बेचने वाली दुकानें।
‘नेशनल वॉटरवे-2’ असम में धुबरी और सादिया के बीच 891 किलोमीटर तक फैला है। यह भारत का सबसे लंबा जलमार्ग है जिस पर जहाज और नावें चल सकती हैं। यह माल, यात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही में मदद करता है, साथ ही चाय, कोयला और उर्वरक (खाद) की आपूर्ति श्रृंखलाओं (सप्लाई चेन) के लिए भी महत्वपूर्ण है।
ब्रह्मपुत्र जलमार्ग पर माल की ढुलाई 2024-25 में 0.90 मिलियन मीट्रिक टन थी, जो 2025-26 में बढ़कर 1.29 मिलियन मीट्रिक टन हो गई।
इन नदी-आधारित लाइटहाउस का मकसद इस महत्वपूर्ण परिवहन मार्ग पर सुरक्षा और मार्गदर्शन को मजबूत करना है। इसके जरिए सुरक्षा ढांचे को पर्यटन के विकास के साथ जोड़ा जा रहा है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म नेविगेशन संबंधी जानकारी को एक जगह लाते हैं
डिजिटल तकनीक, नदियों के जलमार्गों के संचालन में एक और स्तर का सहयोग प्रदान कर रही है। यह नदियों की गहराई, मार्गों, बुनियादी ढांचे, मौसम और जहाजों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी को अधिक सुलभ बनाती है।
इलेक्ट्रॉनिक नेविगेशनल चार्ट (ENCs) हाइड्रोग्राफिक सर्वे डेटा को डिजिटल चार्ट में बदलते हैं, जिससे नाविकों को अपनी यात्रा की योजना बनाने और उसे पूरा करने में मदद मिलती है। सितंबर 2026 तक, 18 चालू और ज्वारीय जलमार्गों के लिए ऐसे चार्ट तैयार कर लिए गए थे। इन्हें ‘पोर्टल फॉर एसेट एंड नेविगेशन इंफॉर्मेशन’ (PANI) और ‘IWAI वेसल ट्रैकर’ जैसे प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया गया है।
2014 से पहले, यह सुविधा केवल ‘नेशनल वॉटरवे-1’ (राष्ट्रीय जलमार्ग-1) पर उपलब्ध थी, जो हल्दिया और प्रयागराज के बीच गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली है।
PANI राष्ट्रीय जलमार्गों और उनसे जुड़े बुनियादी ढांचे के बारे में जानकारी देता है। इसमें फेयरवे (जहाजों के गुजरने का रास्ता), टर्मिनल, नदी के आर-पार बने ढांचे, जेटी कनेक्टिविटी और आपातकालीन सेवाएं शामिल हैं।
PANI और IWAI वेसल ट्रैकर मिलकर वेब और मोबाइल-आधारित नेविगेशन जानकारी प्रदान करते हैं। इसमें जहाजों की रियल-टाइम ट्रैकिंग, अपडेट किए गए मार्ग और पानी की गहराई का विवरण शामिल है।
जहाजों की सुरक्षित, कुशल और टिकाऊ आवाजाही को बढ़ावा देने के लिए 2025 में एक और पहल, ‘नौदर्शिका’ (Naudarshika) – यानी ‘नेशनल रिवर ट्रैफिक एंड नेविगेशन सिस्टम’ – शुरू की गई थी। इसमें नेविगेशन में मदद के लिए ‘लीस्ट अवेलेबल डेप्थ’ (न्यूनतम उपलब्ध गहराई) की रियल-टाइम जानकारी शामिल होती है। यह PANI और ‘लीस्ट अवेलेबल डेप्थ इंफॉर्मेशन सिस्टम’ (LADIS) जैसे मौजूदा डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर काम करती है।
रिवर इंफॉर्मेशन सर्विसेज (RIS) ट्रैफिक मैनेजमेंट में मदद करती हैं।
रिवर इंफॉर्मेशन सर्विसेज (RIS) में जहाज-ट्रैकिंग तकनीक, मौसम और पानी के सेंसर, संचार प्रणालियाँ और सूचना प्रौद्योगिकी को शामिल किया गया है, ताकि जहाज संचालकों और कंट्रोल सेंटरों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान बेहतर हो सके।
नेशनल वॉटरवे-1 पर, गंगा के तीन हिस्सों में RIS लागू की गई है: हल्दिया–फरक्का, फरक्का–पटना और पटना–वाराणसी।
इस नेटवर्क में चार कंट्रोल स्टेशन और 13 बेस स्टेशन हैं। इसमें ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) उपकरण, वेरी हाई फ्रीक्वेंसी (VHF) संचार प्रणाली और मौसम संबंधी सेंसर लगे हैं। इसके अलावा, 30 विभागीय जहाजों पर भी RIS कंसोल लगाए गए हैं।
ये प्रणालियाँ अधिकारियों को जहाजों की आवाजाही पर नज़र रखने, नेविगेशन से जुड़ी जानकारी साझा करने और मौजूदा हालात के आधार पर परिचालन संबंधी निर्णय लेने में मदद करती हैं।
सुरक्षित और अधिक कुशल अंतर्देशीय जलमार्ग विकास की दिशा में
भारत के अंतर्देशीय जलमार्ग विकास में भौतिक अवसंरचना, जलवैज्ञानिक ज्ञान और डिजिटल सूचना प्रणालियों का संयोजन शामिल है। सर्वेक्षण नदियों की नौगम्य गहराई निर्धारित करने में सहायक होते हैं, नौवहन सहायक उपकरण जलमार्गों पर जहाजों का मार्गदर्शन करते हैं, और डिजिटल प्लेटफॉर्म मार्ग नियोजन और यातायात प्रबंधन के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करते हैं।
माल ढुलाई में विस्तार के साथ, इन उपायों का उद्देश्य नौवहन को अधिक पूर्वानुमानित बनाना, सुरक्षा में सुधार करना और अधिक कुशल माल परिवहन को बढ़ावा देना है।
सर्वेक्षण, नौवहन अवसंरचना और वास्तविक समय की जानकारी का एकीकरण पूरे भारत में एक सुरक्षित और स्मार्ट अंतर्देशीय जलमार्ग नेटवर्क के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।

