विक्रमसिंघे ने रविवार को कोलंबो में राष्ट्रपति भवन में अखबार ‘योमीउरी शिंबुन’ के साथ एक साक्षात्कार में कहा, ‘हम नहीं चाहते कि हंबनटोटा का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए किया जाए।’ जापानी अखबार को दिए उनके बयान का उद्देश्य परोक्ष तौर पर भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती समुद्री उपस्थिति को लेकर भारत और अमेरिका में आशंकाओं को दूर करना था। बंदरगाह को चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के हिस्से के रूप में विकसित किया गया था, लेकिन कोलंबो ने 2017 में बीजिंग को बंदरगाह पट्टे पर दे दिया क्योंकि वह ऋण वापस करने में असमर्थ हो गया था।
‘बंदरगाह को लीज पर देना कोई नई बात नहीं’
हालाँकि विक्रमसिंघे ने इस बात पर जोर दिया कि चीन को बंदरगाह पट्टे पर देने में कोई दिक्कत नहीं है। उनका कहना है कि विश्व के कई देश अपने बंदरगाह लीज पर दिए हुए है ‘यह कोई नई बात नहीं है।’ उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने भी बंदरगाहों को पट्टे पर दिया है। भारत, अमेरिका और अन्य देश इसको लेकर चिंतित हैं कि हिंद-प्रशांत में एक प्रमुख यातायात केंद्र हंबनटोटा बंदरगाह चीन के लिए एक सैन्य आधार बन सकता है।
श्रीलंका पंहुचा पोत सैन्य नहीं बल्कि अनुसंधान वाला जहाज है
विक्रमसिंघे ने चीन के साथ कुछ हद तक संबंध बनाए रखने के अपने रुख का संकेत देते हुए कहा, ‘मौजूदा जहाज सैन्य श्रेणी में नहीं आता। (यह) एक अनुसंधान पोत की श्रेणी में आता है। इसलिए (हमने) जहाज को हंबनटोटा आने की अनुमति दी।’ विदेशी मुद्रा की कमी के कारण श्रीलंका गंभीर आर्थिक संकट में है। राष्ट्रपति ने कहा कि उनका इरादा अगस्त के अंत तक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ राहत पैकेत पर बातचीत को अंतिम रूप देने का है। उन्होंने कहा, ‘हम अपने लेनदारों के साथ भी चर्चा शुरू करेंगे… चीन, भारत और जापान सबसे बड़े कर्जदाता हैं।’
अब यह बात इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चिंताजनक हो जाएगी यदि चीन अपने मंसूबों को सफल करने में इन जैसे देशों को अपना बेस बना दे,और समय भी ऐसा ही है क्योंकि इस क्षेत्र के कई देश निवेश के नाम पर कर्ज लेकर शर्तों में बंधे है श्रीलंका की अपनी मज़बूरी है जैसे हालात इस समय वह है,ऐसे में भारत और उसके सहयोगी देशों को चीन की चालाकी को हर संभव कूटनीतिक तरीके से ख़त्म करना है।
